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सिंधु जल संधि, जम्मू-कश्मीर, जलविद्युत परियोजना, भारत-पाक संबंध, विकास
➡️बेतूलहब न्यूज़ |
भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया है और इसके साथ ही पाकिस्तान के साथ एक लंबे समय से चली आ रही जल नीति की रुकावट भी खत्म हो गई है। अब भारत को पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं शुरू करने के लिए किसी अनुमति या डेटा साझा करने की जरूरत नहीं होगी।
क्या था सिंधु जल संधि का बंधन?
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि के तहत छह नदियों को बांटा गया था। सतलुज, ब्यास और रावी भारत के हिस्से में आए, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान के नियंत्रण में रहे। भारत को किसी भी नई परियोजना के लिए पाकिस्तान को छह महीने पहले सूचना देनी होती थी, जिससे कई परियोजनाएं सालों तक अटकी रहीं।

अब क्यों लिया गया ये फैसला?
मोदी सरकार ने अब इस बाधा को हटाकर विकास को प्राथमिकता देने का फैसला किया है। संधि के निलंबन के बाद भारत अब बिना किसी रोक-टोक के अपनी परियोजनाओं को आगे बढ़ा सकता है। यह कदम विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में जलविद्युत परियोजनाओं को गति देगा।
कौन-कौन सी परियोजनाएं होंगी तेज़?
सरकार ने जम्मू-कश्मीर में लंबित 6 प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं पर काम तेज़ करने की योजना बनाई है:
सावलकोट (1,856 मेगावाट) – चिनाब नदी पर
पाकल दुल (1,000 मेगावाट)
रैटल (850 मेगावाट)
बर्सर (800 मेगावाट)
किरू (624 मेगावाट)
किरथाई I और II (1,320 मेगावाट)
क्या होगा भारत को फायदा?
इन परियोजनाओं के पूरे होने पर जम्मू-कश्मीर में 10,000 मेगावाट तक बिजली का उत्पादन संभव होगा। साथ ही सिंचाई, पीने के पानी और औद्योगिक उपयोग के लिए भी जल उपलब्धता बढ़ेगी। इससे जम्मू-कश्मीर में रोजगार, उद्योग और बुनियादी ढांचे के विकास को पंख मिलेंगे।








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