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जातिगत जनगणना, मुस्लिम लीग फॉर्मूला, पसमांदा मुस्लिम, अशराफ-अजलाफ-अरजाल, 2025 जनगणना
94 साल बाद फिर चर्चा में ‘मुस्लिम लीग फॉर्मूला’, मुस्लिमों की जातिगत जनगणना क्यों बनी मुद्दा?
ब्यूरो रिपोर्ट | BetulHub | अपडेट: 6 मई 2025 | 3:51 PM
भारत में 2025 की आगामी जनगणना को लेकर बड़ा बदलाव सामने आ रहा है। इस बार केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना कराने का ऐलान किया है, जिसमें हिंदुओं के साथ मुस्लिमों की जातियों की भी गिनती की जाएगी। अब मुस्लिमों को केवल इस्लाम धर्म ही नहीं, बल्कि अपनी जाति भी बतानी होगी।

यह फैसला एक ऐतिहासिक मोड़ की ओर इशारा करता है। क्योंकि 94 साल पहले, 1931 की जनगणना के बाद ऐसा मौका अब आया है जब मुस्लिम समाज की जातियों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति का आंकलन होगा।
क्या था मुस्लिम लीग का फॉर्मूला?
1941 की जनगणना के दौरान मुस्लिम लीग ने एक सियासी दांव खेला था। उसने मुस्लिमों से अपील की थी कि वे धर्म के कॉलम में “इस्लाम” और जाति के कॉलम में “मुस्लिम” भरें। इसका मकसद था जातिगत विविधता को छिपाकर मुस्लिमों को एकसार दिखाना। यही पैटर्न अब 94 साल बाद फिर से कुछ पोस्टरों और अपीलों में देखने को मिल रहा है।
हालांकि, इन पोस्टरों में किसी संगठन या व्यक्ति का नाम नहीं है, पर 2011 की जनगणना में भी इसी तरह की अपीलें देखी गई थीं।
क्यों जरूरी है मुस्लिमों की जातिगत गणना?
भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम समाज तीन वर्गों में बंटा है:
अशराफ (उच्च जाति): सैय्यद, शेख, पठान, मुगल
अजलाफ (पिछड़ी जाति): अंसारी, कुरैशी, मंसूरी, सैफी आदि
अरजाल (अतिपिछड़ी जाति): धोबी, मेहतर, हलालखोर, नट आदि
कहा जाता है कि मुस्लिमों का 85% हिस्सा पसमांदा वर्ग से आता है, लेकिन तमाम सरकारी योजनाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में इनकी भागीदारी बेहद कम है।
जातिगत जनगणना से क्या फर्क पड़ेगा?
इस बार की जातिगत जनगणना के जरिए मुस्लिम समाज की सामाजिक और आर्थिक विषमता का वास्तविक आंकड़ा सामने आ सकेगा। अभी तक मुस्लिमों को एक धार्मिक इकाई मानकर ही आंकड़े जुटाए जाते थे, जिससे पसमांदा वर्ग की स्थिति हमेशा अनदेखी रह गई।
अगर जनगणना में जातियों की सही जानकारी सामने आती है, तो पसमांदा मुस्लिम अपने आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी की मांग को मजबूती से उठा सकेंगे।









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