Highlights:
जातिगत जनगणना में पहली बार जाति से जुड़े सवाल पूछे जाएंगे।
कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने आरक्षण की 50% लिमिट हटाने की मांग की।
जातिगत आरक्षण के भीतर ‘कोटे में कोटा’ की बहस तेज होने की संभावना।
SC वर्ग की उप-जातियों के उपवर्गीकरण पर राज्यों में शुरू हुआ काम।
ओपन कैटिगरी के लिए सीटें घटने का सवाल बना बड़ी चिंता।
नई दिल्ली। भारत में पहली बार जातिगत जनगणना की तैयारी हो रही है और इसके राजनीतिक और सामाजिक असर दूरगामी हो सकते हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने ऐलान किया है कि अगली जनगणना में जाति से जुड़ा कॉलम भी शामिल किया जाएगा। अब सरकारी कर्मचारी घर-घर जाकर लगभग 30 सवाल पूछेंगे, जिनमें से एक अहम सवाल होगा — आपकी जाति क्या है?

इस कदम का मकसद यह समझना है कि देश में किस जाति की कितनी आबादी है, जिससे सामाजिक योजनाओं और नीतियों को और प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके।
अब सवाल उठने लगे हैं कि इस जनगणना के बाद आरक्षण की सीमा, कोटे के भीतर कोटा, और ओपन कैटिगरी की सीटों जैसे अहम मुद्दों पर क्या बदलाव होंगे।
1. 50% आरक्षण सीमा खत्म करने की मांग
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर मांग की है कि आरक्षण की सीमा को 50% से ऊपर बढ़ाया जाए और इसके लिए संविधान संशोधन किया जाए। अगर जनगणना में पता चलता है कि OBC, SC और ST की कुल आबादी 70% के आसपास है, तो यह मांग और भी तेज हो सकती है।
2. कोटे में कोटा की बहस होगी तेज
सुप्रीम कोर्ट पहले ही अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण (sub-categorization) को सही ठहरा चुका है। हरियाणा और कर्नाटक जैसे राज्यों ने इस दिशा में कदम भी बढ़ाए हैं। अब जातिगत आंकड़े आने के बाद इस मांग को और मजबूती मिल सकती है कि कमजोर उप-जातियों को अलग से आरक्षण मिले।
3. ओपन कैटिगरी के लिए सीटें कितनी बचेंगी?
EWS के लिए पहले से 10% आरक्षण लागू है। OBC, SC और ST को मिलाकर 49.5% आरक्षण पहले से है। अगर सीमा बढ़ती है तो सवाल यह है कि ओपन कैटिगरी (General Category) के लिए कितनी सीटें बचेंगी? यह मुद्दा आने वाले समय में बहस का बड़ा विषय बन सकता है।
निष्कर्ष:
जातिगत जनगणना सिर्फ एक आंकड़ा जुटाने का काम नहीं है, यह देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करने में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है। आने वाले वर्षों में यह डेटा कई अहम नीतिगत फैसलों की नींव बन सकता है।









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