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जातीय जनगणना पर बीजेपी का बड़ा दांव: अखिलेश यादव से छीना मुद्दा, अब क्या होगी S.P. की नई रणनीति?
नई दिल्ली/लखनऊ:
केंद्र सरकार द्वारा जातीय जनगणना कराने के ऐलान ने समाजवादी पार्टी (S.P.) के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र ने घोषणा की है कि आगामी जनगणना के साथ जातीय आधार पर भी आंकड़े जुटाए जाएंगे।
यह वही मुद्दा है, जिसे अखिलेश यादव ने बीते महीनों में पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के एजेंडे के साथ जोर-शोर से उठाया था। अब जब भाजपा ने इसे अपना लिया, तो सवाल है कि समाजवादी पार्टी अगला कदम क्या उठाएगी?

भाजपा ने छीना बड़ा मुद्दा, फिर भी पीछे नहीं हटेगी S.P.
समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को छोड़ने के मूड में नहीं है। पार्टी अब इसे और व्यापक बनाते हुए ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के नारे को धार देने की रणनीति पर काम कर रही है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर पिछड़ों और दलितों की अनदेखी का आरोप पहले से ही S.P. लगाती रही है।
अखिलेश का सीधा वार: “सिंह भाई” पर तंज
हाल ही में अखिलेश यादव ने प्रदेश के थानों में तैनात अधिकारियों की जातिवार सूची पेश करते हुए सरकार पर ठाकुरों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया। सूचना विभाग में हुए तबादलों को लेकर भी उन्होंने चुटकी ली, कहा— “एक सिंह भाई गए, दूसरा सिंह भाई आ गया।”
विपक्ष के दबाव में फैसला? सपा प्रवक्ता का दावा
सपा प्रवक्ता सुनील साजन ने सरकार के इस फैसले को विपक्ष के दबाव का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि यह विपक्ष की ताकत और लगातार उठाए गए मुद्दों का असर है कि सरकार ने आखिरकार घुटने टेक दिए।
संसद में आगे की रणनीति का संकेत
अखिलेश यादव पहले ही संसद में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि यदि उन्हें मौका मिला तो जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय की दिशा में बड़े कदम उठाएंगे। उनका जोर अब आरक्षण की बहाली और विस्तार पर रहेगा।
उन्होंने कहा था कि आउटसोर्सिंग और प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण खत्म किया जा रहा है, और विश्वविद्यालयों में ‘NFS (Not Found Suitable)’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर पिछड़ों को दरकिनार किया जा रहा है।
निष्कर्ष:
जातीय जनगणना का मुद्दा अब सिर्फ गणना का नहीं, बल्कि राजनीतिक हिस्सेदारी और सामाजिक न्याय का भी बन गया है। देखना होगा कि समाजवादी पार्टी इस नये राजनीतिक परिदृश्य में किस तरह अपनी रणनीति गढ़ती है।




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