Highlights:
चीन ने बनाया दुनिया का पहला थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर
भारत के पास दुनिया का 25% थोरियम भंडार
थोरियम रिएक्टर कम रेडियोधर्मी कचरा और अधिक सुरक्षा देते हैं
भारत ने सबसे पहले थोरियम रिएक्टर की संभावना को पहचाना
चीन अब 10 मेगावाट के बड़े रिएक्टर पर कर रहा है काम

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भारतीय खोज पर चीन का कब्जा: दुनिया का पहला थोरियम रिएक्टर बना डाला, भारत देखता रह गया
दुनिया की अगली बड़ी ऊर्जा क्रांति थोरियम पर टिकी हो सकती है, और इस रेस में फिलहाल चीन सबसे आगे निकल चुका है। चीन ने गांसु प्रांत के गोबी रेगिस्तान में दुनिया का पहला थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर तैयार कर लिया है। इस उपलब्धि के साथ ही चीन ने अमेरिका, रूस और फ्रांस जैसे दिग्गज देशों को पीछे छोड़ते हुए विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाई है।
यह रिएक्टर “थोरियम मोल्टन सॉल्ट रिएक्टर” तकनीक पर आधारित है और इसकी क्षमता 2 मेगावाट बिजली उत्पादन की है। चीन ने 2011 में इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी और अब वह 2030 तक 10 मेगावाट का बड़ा रिएक्टर लगाने की योजना पर काम कर रहा है।
थोरियम रिएक्टर: भविष्य की ऊर्जा का रास्ता
थोरियम आधारित रिएक्टर न सिर्फ ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं, बल्कि ये पारंपरिक यूरेनियम रिएक्टरों की तुलना में कम रेडियोधर्मी कचरा भी पैदा करते हैं। इसके अलावा, थोरियम से परमाणु हथियार बनाना बेहद कठिन होता है, जिससे यह तकनीक रणनीतिक रूप से भी सुरक्षित मानी जाती है।
भारत क्यों पिछड़ा?
भारत ने सबसे पहले थोरियम पर आधारित ऊर्जा की संभावना को पहचाना था। भारत के पास दुनिया का करीब 25 प्रतिशत थोरियम भंडार मौजूद है, जो उसे इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकता है। भारत का तीन-चरणीय न्यूक्लियर प्रोग्राम भी थोरियम पर आधारित था। लेकिन नौकरशाही बाधाएं, तकनीकी जटिलताएं और उच्च लागत के कारण भारत अब तक इसका व्यावसायिक उपयोग नहीं कर पाया।
थोरियम को सीधे तौर पर रिएक्टर में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसे पहले यूरेनियम-233 में परिवर्तित करना होता है, जो कि एक महंगी और जटिल प्रक्रिया है। यही कारण है कि भारत, थोरियम की अपार संभावनाओं के बावजूद, अब तक कोई व्यावसायिक रिएक्टर स्थापित नहीं कर सका।
क्या भारत अब भी पकड़ सकता है रेस?
हालांकि चीन ने बड़ी बढ़त ले ली है, लेकिन भारत के पास अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा थोरियम संसाधन है। यदि रणनीतिक रूप से निवेश किया जाए और नीति स्तर पर प्राथमिकता दी जाए, तो भारत इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व पा सकता है।




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