☀️ मुख्य बातें:
- होली की रात जस्टिस यशवंत वर्मा के घर भारी मात्रा में नकदी मिली।
- FIR दर्ज करने के लिए सीजेआई की मंजूरी जरूरी।
- 1991 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का होगा प्रभाव।
- दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट हुआ ट्रांसफर।
- न्यायपालिका में जांच और जवाबदेही की मांग तेज।

➡️ कैसे सामने आया कैश कांड?
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद एक कमरे में भारी मात्रा में नकदी मिली। जब दमकल कर्मियों और पुलिस ने आग बुझाई, तो कैश से भरी बोरियां मिलीं। इस घटना के बाद सीजेआई संजीव खन्ना ने कोलेजियम बैठक बुलाकर जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया।
➡️ क्या दर्ज होगी FIR? 1991 का सुप्रीम कोर्ट फैसला क्या कहता है?
1991 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार,
- हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया जा सकता है।
- लेकिन, FIR दर्ज करने के लिए सीजेआई की मंजूरी जरूरी है।
- अगर सीजेआई को लगता है कि मामला मजबूत नहीं है, तो FIR नहीं होगी।
- राष्ट्रपति भी अभियोजन की मंजूरी दे सकते हैं, लेकिन सीजेआई की सलाह पर ही।
➡️ 1991 के केस से जस्टिस वर्मा का कनेक्शन
यह मामला मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के. वीरस्वामी के केस से जुड़ा है। उन पर आय से अधिक संपत्ति का आरोप लगा था, लेकिन उन्होंने दलील दी कि सरकार की अनुमति के बिना जज पर मुकदमा नहीं चल सकता। सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में ‘इन-हाउस प्रॉसिजर’ लागू कर जजों की जांच और अनुशासन की प्रक्रिया तय की थी।
➡️ क्या होगा जस्टिस वर्मा पर एक्शन?
- दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने कैश की तस्वीरें और वीडियो दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को भेजे।
- अब तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई है क्योंकि सरकार ने सीजेआई से राय नहीं ली।
- अगर सीजेआई मंजूरी देते हैं, तो जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज हो सकता है।
☀️ निष्कर्ष
जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला सुप्रीम कोर्ट के 1991 के फैसले से सीधे जुड़ा है। एफआईआर तभी दर्ज होगी जब सरकार सीजेआई से राय लेगी। फिलहाल, न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठ रही है।









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