क्या जज के खिलाफ FIR दर्ज हो सकती है? जानिए 1991 के ऐतिहासिक फैसले का असर
हाइलाइटेड शब्द:
जस्टिस यशवंत वर्मा, सुप्रीम कोर्ट, एफआईआर, भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1991 का फैसला
समाचार विवरण:
जस्टिस यशवंत वर्मा के घर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने की खबर के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले की जांच के लिए तीन जजों की एक विशेष कमेटी गठित की गई है। समिति के समक्ष पेश होने से पहले जस्टिस वर्मा ने पांच वकीलों से कानूनी सलाह ली है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या जस्टिस वर्मा के खिलाफ आम नागरिकों की तरह एफआईआर दर्ज हो सकती है?

1991 का सुप्रीम कोर्ट फैसला और जजों के खिलाफ केस
इस पूरे मामले में 1991 के सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले की चर्चा हो रही है, जो हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के. वीरास्वामी के केस से जुड़ा था। इस फैसले के अनुसार, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के जजों के खिलाफ भी आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जा सकता है।
हालांकि, सीआरपीसी की धारा 154 के तहत बिना भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की मंजूरी के एफआईआर दर्ज नहीं हो सकती। इसके अलावा, अगर CJI की राय में मामला दंडनीय नहीं है, तो केस आगे नहीं बढ़ सकता।
कैसे दर्ज होगी FIR?
यदि किसी जज के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत मामला बनता है, तो उसके खिलाफ राष्ट्रपति की अनुमति से केस फाइल किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में CJI से सलाह लेना अनिवार्य है।
दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने जस्टिस वर्मा के घर मिले कैश के फोटो और वीडियो दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को सौंपे हैं। लेकिन FIR तभी दर्ज होगी, जब सरकार आधिकारिक रूप से CJI से अनुमति मांगेगी।
महाभियोग ही एकमात्र तरीका?
किसी सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को पद से हटाने के लिए भारत के संविधान में महाभियोग की प्रक्रिया निर्धारित है। संसद के दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होने पर ही जज को हटाया जा सकता है।
निष्कर्ष:
1991 के फैसले में साफ कहा गया था कि जज भी एक लोकसेवक है और उस पर भ्रष्टाचार निरोधक कानून लागू होता है। अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट और सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती हैं।




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