क्या है पूरा मामला?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी लड़की के निजी अंग छूना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना ‘अटेम्प्ट टु रेप’ (बलात्कार की कोशिश) नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों पर लगी IPC की धारा 376 और POCSO एक्ट की धारा 18 को हटा दिया और कम गंभीर धाराओं में मामला चलाने का आदेश दिया।
यह मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का है, जहां 14 साल की नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न की घटना हुई थी। हाईकोर्ट के इस फैसले से निचली अदालतों में यौन अपराधों से जुड़े मामलों में आरोप तय करने के तरीके पर असर पड़ सकता है।

घटना का पूरा विवरण
✔️ तारीख: 10 नवंबर 2021
✔️ स्थान: कासगंज, उत्तर प्रदेश
✔️ पीड़िता: 14 वर्षीय नाबालिग लड़की
👉 क्या हुआ था?
- पीड़िता अपनी मां के साथ ननद के घर से लौट रही थी।
- रास्ते में आरोपी पवन, आकाश और अशोक मिले। पवन ने लड़की को बाइक से घर छोड़ने की पेशकश की।
- मां के भरोसे के बाद पीड़िता बाइक पर बैठ गई, लेकिन रास्ते में आरोपियों ने मोटरसाइकिल रोक दी।
- पवन और आकाश ने लड़की के निजी अंग छुए, आकाश ने उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ दिया और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की।
- लड़की के चिल्लाने पर ट्रैक्टर से आ रहे सतीश और भूरे मौके पर पहुंचे।
- आरोपियों ने गवाहों पर पिस्तौल तान दी और फरार हो गए।
- जब पीड़िता की मां शिकायत लेकर आरोपी पवन के घर पहुंची, तो उसके पिता अशोक ने धमकी दी और गाली-गलौज की।
पीड़िता की मां ने अगले दिन पुलिस में FIR दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उसने अदालत का रुख किया और मामला आगे बढ़ा।
कैसे बदला मामला?
✔️ 21 मार्च 2022 को अदालत ने शिकायत को स्वीकार किया और सुनवाई शुरू की।
✔️ आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 376 (बलात्कार), 354 (छेड़छाड़), 354B (महिला को निर्वस्त्र करने की कोशिश) और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत केस दर्ज हुआ।
✔️ पवन और आकाश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की और आरोपों पर दोबारा विचार करने की मांग की।
✔️ हाईकोर्ट ने ‘अटेम्प्ट टु रेप’ (बलात्कार की कोशिश) का आरोप हटाते हुए, IPC की धारा 376 और POCSO की धारा 18 को हटा दिया।
✔️ अब आरोपियों पर IPC की धारा 354B और POCSO एक्ट की धारा 9 और 10 के तहत मुकदमा चलेगा।
कोर्ट ने ‘अटेम्प्ट टु रेप’ के चार्ज क्यों हटाए?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने 3 प्रमुख तर्क दिए:
1️⃣ यौन उत्पीड़न और बलात्कार की कोशिश में अंतर होता है।
- आरोपियों ने लड़की के निजी अंग छुए, लेकिन इसे बलात्कार की कोशिश नहीं माना जा सकता।
- पीड़िता के कपड़े पूरी तरह नहीं उतारे गए थे, और कोई अन्य अश्लील हरकत नहीं हुई थी।
2️⃣ ‘अटेम्प्ट टु रेप’ (बलात्कार की कोशिश) साबित करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं।
- केवल पायजामे का नाड़ा तोड़ना और लड़की को खींचने की कोशिश करना बलात्कार की कोशिश नहीं माना जा सकता।
- ‘अटेम्प्ट टु रेप’ के लिए आरोपी का इरादा और कदम स्पष्ट रूप से साबित होना चाहिए।
3️⃣ बलात्कार की कोशिश और बलात्कार की तैयारी में फर्क होता है।
- तैयारी: जब कोई अपराध करने के लिए योजना बनाता है या साधन जुटाता है।
- कोशिश: जब अपराधी सीधा कदम उठाता है लेकिन सफल नहीं हो पाता।
- इस मामले में कोर्ट ने कहा कि यह केवल बलात्कार की ‘तैयारी’ थी, न कि ‘कोशिश’।
हाईकोर्ट के फैसले का प्रभाव
🔹 महिलाओं की सुरक्षा पर असर:
- हाईकोर्ट के फैसले से यौन उत्पीड़न के मामलों में आरोप तय करने का तरीका बदल सकता है।
- भविष्य में अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी ने ‘तैयारी’ से आगे बढ़कर ‘कोशिश’ की थी।
🔹 अपराधियों को कम सजा का रास्ता:
- बलात्कार की कोशिश की तुलना में यौन उत्पीड़न की सजा कम होती है।
- अगर निचली अदालतें इस फैसले का अनुसरण करती हैं, तो कई मामलों में आरोपियों को कम सजा मिल सकती है।
🔹 आरोपियों के लिए बचने का रास्ता:
- इस फैसले के बाद यौन अपराधी बचने की कोशिश कर सकते हैं।
- ‘इरादे की पुष्टि’ एक बड़ा मुद्दा बन सकता है, जिससे कई मामलों में दोषियों को कम सजा मिलेगी।
अब आरोपियों पर कौन-कौन सी धाराएं लागू होंगी?
✔️ IPC धारा 354B:
- महिला को निर्वस्त्र करने की कोशिश या जबरन कपड़े उतारने का प्रयास।
- सजा: 3 से 7 साल तक की जेल और जुर्माना।
✔️ POCSO अधिनियम की धारा 9 और 10:
- गंभीर यौन उत्पीड़न का मामला।
- सजा: 5 से 7 साल की जेल और जुर्माना।
क्या आरोपी बच जाएंगे?
❌ नहीं, आरोपी पूरी तरह नहीं बचेंगे।
✅ हाईकोर्ट ने सिर्फ रेप की कोशिश के आरोप हटाए हैं, लेकिन यौन उत्पीड़न का मामला जारी रहेगा।
✅ आरोपियों को 3 से 7 साल तक की सजा हो सकती है।
✅ निचली अदालत में अब नए सिरे से केस चलेगा।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला कानूनी रूप से सही हो सकता है, लेकिन इससे महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
✔️ यौन उत्पीड़न और बलात्कार की कोशिश के बीच का अंतर अब और स्पष्ट हो गया है।
✔️ अब ऐसे मामलों में अभियोजन पक्ष को ठोस सबूत देने होंगे।
✔️ अगर इस फैसले का दुरुपयोग हुआ, तो यह महिला सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
अब देखना यह होगा कि क्या इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी या नहीं।









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