आमतौर पर आठ साल के बच्चे खिलौनों से खेलते या शरारतें करते नजर आते हैं, लेकिन इंदौर के 8 वर्षीय शौर्य पैट्रिक ने अपने हुनर से सभी को चौंका दिया है। शौर्य ने अपने पिता यश पैट्रिक, जो बधिर हैं, पर एक किताब लिखी है। इस किताब का नाम “नॉर्मलाइज बीइंग डिफरेंट” है, जिसमें शौर्य ने साइन लैंग्वेज की उपयोगिता और मूक-बधिरों की चुनौतियों को सरल तरीके से समझाया है।

कैसे हुई किताब की शुरुआत?
शौर्य की मां शुचि के मुताबिक, स्कूल असाइनमेंट के दौरान शौर्य को मूक-बधिरों पर लिखने का विचार आया। चूंकि उनके घर में साइन लैंग्वेज मातृभाषा की तरह है और उनके पिता खुद साइन लैंग्वेज टीचर हैं, इसलिए यह काम थोड़ा आसान हो गया।
शौर्य ने रोजाना स्कूल के बाद अपनी मां से सवाल पूछे और उनके जवाब के आधार पर किताब लिखी।
करीब 10 दिनों में 33 पन्नों की यह किताब तैयार हो गई।
सबसे बड़ी चुनौती चित्रों का चयन और सामग्री को सरल बनाना था, लेकिन शौर्य ने हार नहीं मानी।
पिता के लिए गहरा प्यार और प्रेरणा
शौर्य का कहना है कि उसके पिता भले ही बधिर हैं, लेकिन उसके लिए वे हमेशा नॉर्मल हैं। वह साइन लैंग्वेज में अपने पिता से बातें करता है और उनके साथ गहरा रिश्ता साझा करता है।
शौर्य को कभी महसूस नहीं हुआ कि उसके पिता दूसरों से अलग हैं।
उसने ठान लिया था कि अगर वह किताब लिखेगा तो सिर्फ अपने पिता पर ही लिखेगा।
किताब की विशेषताएं और प्रकाशन
यह किताब खासतौर पर कक्षा 3 और 4 के बच्चों के लिए लिखी गई है।
इसमें साइन लैंग्वेज की उपयोगिता को सरल और रोचक ढंग से पेश किया गया है।
शौर्य की स्कूल ने इस किताब को पब्लिश करवाने में मदद की।
यह किताब अब ऑनलाइन उपलब्ध है, और लोग इसे पढ़कर शौर्य के काम की सराहना कर रहे हैं।
एक प्रेरक संदेश
शौर्य की यह कहानी दिखाती है कि समझदारी और प्यार की कोई उम्र नहीं होती। इतना छोटा होने के बावजूद उसने अपने पिता के प्रति सम्मान और प्यार को खूबसूरती से व्यक्त किया है। उसकी किताब न सिर्फ प्रेरणादायक है, बल्कि यह मूक-बधिरों के लिए जागरूकता बढ़ाने का काम भी कर रही है।
शौर्य की यह अनोखी पहल साबित करती है कि अगर इंसान में जज्बा हो, तो वह छोटी उम्र में भी बड़ी मिसाल कायम कर सकता है।









Leave a Reply